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Showing posts from January, 2021

हिंदी साहित्य में भारतीय मूल्यों की अभिव्यक्ति : इकाई 1 एम. ए. हिंदी साहित्य प्रश्न पत्र चार

 हिंदी साहित्य में भारतीय मूल्यों की अभिव्यक्ति  इससे मुख्यतः दो सवाल बनते हैं जिनमें से पहला सवाल इस प्रकार है - 1.  "हिंदी साहित्य में जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति हुई है।" कथन को सोदाहरण पुष्ठित कीजिये। दुसरा सवाल है - 2. हिंदी साहित्य में भारतीय मूल्यों की अभीव्यक्ति के अंतर्गत आदिकालीन साहित्य में मूल्य अभिव्यक्ति की मीमांसा कीजिये।  तो पहले सवाल का उत्तर इस प्रकार होगा - `हिंदी साहित्य का पटल अत्यंत व्यापक है। विगत 1000 वर्षों में रचित विशाल साहित्य जो हिंदी भाषी प्रदेश में रचा गया , हिंदी साहित्य के अंतर्गत समाविष्ट है। इसे मोटे तौर पर चार कालखंडों - आदिकाल, भक्तिकाल , रीतिकाल और आधुनिक कल में विभक्त किया गया है। साहित्य साहित्य की अनेक विधाएँ हैं, जिन्हें मोटे तौर पर पद्य और गद्य में विभक्त किया गया है। साहित्य का व्यापक उद्देश्य 'सर्वजन हिताय , सर्वजन सुखाय:' माना गया है। वह रसानुभूति के द्वारा आनंद प्रदान करता है, श्रेय को प्रेय रूप में व्यक्त करता है तथा लोककल्याण का विधान करता है।  जीवन मूल्यों का तात्पर्य उन मान्यताओं से है जिन्हें हम अपने जीवन म...

भारतीय साहित्य के अध्ययन की प्रमुख समस्याएं : इकाई 1 एम. ए. हिंदी साहित्य प्रश्न पत्र चार

 भारतीय साहित्य के अध्ययन की प्रमुख समस्याएं भारतीय साहित्य से तात्पर्य अखिल भारतीय स्तर पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में अब तक लिखे जा रहे साहित्य से है। जिन भारतीय भाषाओं में यह साहित्य लिखा जा रहा है। उन्हें मोटे तौर पर हम आधुनिक आर्य भाषाएं और द्रविड़ भाषाएं जैसे दो वर्गों में बांट सकते हैं। जहां एक प्राचीन साहित्य का संबंध है। वह लगभग पिछले दो हजार वर्षों पुराना साहित्य है, जो मुख्यतः संस्कृत में उपलब्ध है, ऐसा कुछ साहित्य विभिन्न अपभ्रंश, प्राकृत और द्रविड़ भाषाओं में विशेषकर तमिल में उपलब्ध है। आधुनिक कहा जाने वाला साहित्य परिणाम में बहुत अधिक लिखा जा चुका है और लिखा भी जा रहा है। जब हम इस पूरे साहित्य के अध्ययन की समस्याओं पर विचार करते हैं। तो यह समस्याएं प्राचीन और आधुनिक दोनों ही प्रकार के साहित्य से जुड़ी हुई हैं। प्राचीन साहित्य का अधिकांश चूंकि संस्कृत में है। इसलिए इसे लेकर इतनी समस्या नहीं है। कितनी भी प्राचीन अप्रैल और तमिल साहित्य को लेकर है। आधुनिक साहित्य को लेकर ये समस्याएं कई गुण इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि आधुनिक भाषाओं की संख्या जिनमें साहित्य लिखा जा रहा है 26 से...

भारतीय साहित्य का स्वरूप : इकाई 1 एम. ए. हिंदी साहित्य प्रश्न पत्र चार

भारतीय साहित्य का स्वरूप भारतीय साहित्य का स्वरूप इससे हमें क्या पता चलता है। भारतीय मतलब भारत का, तथा स्वरूप का अर्थ होता है अपनी विशेष्ता से युक्त इस प्रकार भारतीय साहित्य का स्वरूप का सामान्य अर्थ यही होता है की भारतीय साहित्य अपने आप की विशेषता को अभिभूत करती है या यूं कहें की यह अपने आप की विशेषता को बताती है।  तो भारतीय साहित्य को समझने से पहले हमें भारत के एकता और अखंडता को ठीक से समझना होगा तभी हम भारतीय साहित्य के स्वरूप को समझ सकते हैं। आपको पता ही होगा की भारत विभिन्न भाषाओं से युक्त एक विशाल देश है जहां अनेक बोलियों के साथ-साथ विभिन्न भाषाएँ भी बोली जाती हैं। अगर हम भाषा की बात करें तो उत्तर पश्चिम में पंजाबी, हिंदी और उर्दू, मध्य पश्चिम में गुजराती और मराठी भाषाएं बोली जाती है। वही दक्षिण की बात करें तो तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम के अलावा कश्मीरी कोंकड़ी और सिंधी डोंगरी इत्यादि भी पर्याप्त प्राचीनता रखती हैं।  "यदि भारतीय भाषाओं के समग्र वांग्मय का संचय किया जाए तो, किसी भी स्थिति में यूरोपीय साहित्य से कम नही होगा ऐसा जान पड़ता है। इसके साथ ही वैदीक संस...

भारतीय साहित्य में आज के भारत का बिम्ब : इकाई 1 एम. ए. हिंदी साहित्य प्रश्न पत्र चार

 भारतीय साहित्य में आज के भारत का बिम्ब इससे संबंधित निम्न सवाल बन सकते हैं जो की इस प्रकार हैं - भारतीय साहित्य में आज के भारत के बिम्ब की दृष्टि से मुलभूत एकता पर प्रकाश डालिए।  भारतीय साहित्य में आज के भारत का प्रतिबिम्ब उपलब्ध होता है, इस कथन पर तर्कपूर्ण ढंग से प्रकाश डालिये।  क्या आधुनिक भारतीय साहित्य में मानवतावाद, लोककल्याण , आध्यात्मिकता के स्वर विद्यमान हैं, सोदाहरण प्रकाश डालिए।  क्या भारतीय साहित्य में वर्तमान भारत प्रतिबिम्बित है। तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।  इन सभी सवालों के उत्तर इस प्रकार लिखे जा सकते हैं - स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय जन-जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए। आजादी के बाद की पीढ़ी जब युवा हुई तो उसका लोकतंत्र और उसके नेतृत्व से मोहभंग होने लगा था। परम्परागत समस्याएं तो विद्धमान थी हीं, युवा पीढ़ी को नयी समस्याओं से भी जूझना पड़ा। भारतीय जनमानस पर इसकी गंभिर प्रतिक्रिया हुई। अशिक्षा, बेरोजगारी, निर्धनता जैसी आर्थिक समस्याएँ दहेज, नारी शोषण, दलितों का शोषण जैसी सामाजिक समस्याएं यथा भ्र्ष्टाचार, लूट, अराजकता, नेतृत्व का दोमुँहापन, आतंकवाद , लूट-हत्...