भारतीय साहित्य का स्वरूप : इकाई 1 एम. ए. हिंदी साहित्य प्रश्न पत्र चार
भारतीय साहित्य का स्वरूप
भारतीय साहित्य का स्वरूप इससे हमें क्या पता चलता है। भारतीय मतलब भारत का, तथा स्वरूप का अर्थ होता है अपनी विशेष्ता से युक्त इस प्रकार भारतीय साहित्य का स्वरूप का सामान्य अर्थ यही होता है की भारतीय साहित्य अपने आप की विशेषता को अभिभूत करती है या यूं कहें की यह अपने आप की विशेषता को बताती है।
तो भारतीय साहित्य को समझने से पहले हमें भारत के एकता और अखंडता को ठीक से समझना होगा तभी हम भारतीय साहित्य के स्वरूप को समझ सकते हैं। आपको पता ही होगा की भारत विभिन्न भाषाओं से युक्त एक विशाल देश है जहां अनेक बोलियों के साथ-साथ विभिन्न भाषाएँ भी बोली जाती हैं।
अगर हम भाषा की बात करें तो उत्तर पश्चिम में पंजाबी, हिंदी और उर्दू, मध्य पश्चिम में गुजराती और मराठी भाषाएं बोली जाती है। वही दक्षिण की बात करें तो तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम के अलावा कश्मीरी कोंकड़ी और सिंधी डोंगरी इत्यादि भी पर्याप्त प्राचीनता रखती हैं।
"यदि भारतीय भाषाओं के समग्र वांग्मय का संचय किया जाए तो, किसी भी स्थिति में यूरोपीय साहित्य से कम नही होगा ऐसा जान पड़ता है। इसके साथ ही वैदीक संस्कृत, लौकिक संस्कृत पाली, प्राकृत एवं अपभ्रंश साहित्य का समावेश करने पर इसका विस्तार अनंत सीमा को पार कर जाता है।"
भारतीय साहित्य में एकता और विविधता दोनों है जिसके आधार पर विभिन्न भाषाओं में रचनाएं रचे गए भारतीय साहित्य जो की दीर्घकालिक हैं। जिसमें भारतीय रिक्थ से प्राप्त एकता है - एवं क्षेत्रीय प्रभाव द्वारा प्रकाशित उनकी निजता-विविधता के रूप में व्यक्त हुई है।
"भारतीय साहित्य भारतीय जन गण की तरह विविधता और एकता के परस्पर सूत्रों में बनी हुई एक्शन इकाई है विभिन्न धाराओं व्यक्तित्व और विचार श्रेणियों के लोकतांत्रिक अनु कूपन से ही वह वजूद में आती है। "
भारतवर्ष अनेक भाषाओं वाला एक विशाल देश है। भारतीय संविधान में शामिल हर भाषा की विपुल साहित्य राशि भारतीय साहित्य के नाम से जानी जाती है।
इस विपुल साहित्य राशि में प्रत्येक भाषा साहित्य का अपना प्रखर वैशिष्ट्य है। हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी की सीमाएं कितनी भी मिली हुई क्यों ना हो - उनके विशेषताएं अलग और सुरक्षित हैं। बांग्ला, उड़िया, असमिया में बहुत कुछ समानताएं हैं, लेकिन उनके लोक, समाज एवं क्षेत्रीय विविधता ने उनेमें बहुत सी विभिन्नता भी कर दी हैं। तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ का उत्स एक होने पर भी उन्हें पर्याप्त अंतर भी है।
साहित्य का यह अंतर दरअसल संस्कृतियों एवं रीति-रिवाज खानपान, लोकाचार के बाद भी हमारी भारतीयता का मूल एक ही है और संदिग्ध भी है। उसी तरह भारतीय भाषाओं की एकता अपूर्व है। उनकी विविधता मौलिक और रमणीय है।
भारतीय साहित्य की समानता के बिंदु अधोलिखित हैं:
- दक्षिण में तमिल और उत्तर में उर्दू को छोड़कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं का उद्भव एक ही समय में हुआ है।
- सभी भारतीय भाषाओं के विकास के चरण भी लगभग समान ही हैं। प्रायः सभी का आदिकाल 15वीं सदी तक चला है। मुगल वैभव के अंत तक मध्य काल है। इसी तरह सभी भारतीय भाषाओं के विकास के चरण लगभग चार कालों में विभक्त हैं।
- स्पष्ट है कि भारत का राजनीतिक और सामाजिक माहौल हर धर्म और जाति को समान रूप से प्रभावित कर रहा था। मुगलों के साम्राज्य का विस्तार एवं उनका भारतीय विरोध हर सुबे और भारत के हर हिस्से में एक समान रहा। धार्मिक आंदोलन में एक से ही रहे। रामकृष्ण के सगुण भक्ति एवं योग और साधुओं के निर्गुण भक्ति भी एक समान ही साहित्य को प्रभावित कर रही थी, भले ही अभिव्यक्ति का माध्यम कोई भाषा क्यों ना हो। इसी तरह मुगलों के बढ़ते प्रभाव एवं ईरानी संस्कृति के प्रचार से एक नागर सत्ता का विकास भी भारत में हो रहा था। लेकिन इस संस्कृति का विकास ज्यादा समय नहीं चला और यह अपना प्रभाव होने लगी यहां विलासिता का बोलबाला हो गया और हर भाषा में यहां काल रीतिकाल का है।
- भारतीय भाषाओं के साहित्य का यदि साहित्यिक पृष्ठभूमि पर विचार किया जाए, तो वह एक ही है। रामायण, महाभारत, पुराण, भागवत, संस्कृत का अभिजात साहित्य हर भारतीय भाषा की समान रूप से धरोहर है। कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट, पाणिनि, श्रीहर्ष, अमरूक, जयदेव आदि की अमर कृतियां बौद्ध और जैन साहित्य नेम सभी भारतीय भाषाओं को अपने पूर्व आधार के रूप में ग्रहण किया।
सभी भारतीय भाषाओं के लिए उपर्युक्त ग्रंथ अक्षय प्रेरणा स्रोत है। इनके विचारों का प्रयोग सभी ने आधार के लिए किया है। यही कारण है कि भारतीय साहित्य में मूल रूप से समानता आ गई है। समान आधार सामग्री को लेकर रचा गया भारतीय साहित्य काफी दूर तक समानता भी रखती है लेकिन क्षेत्रीय विशेषताओं ने उन्हें वैविध्य पूर्ण बनाया है।
भारतीय साहित्य की समान प्रवृतियां अधोलिखित है:
- नाथ साहित्य
- चारण काव्य
- संत काव्य
- प्रेमा आख्यानक काव्य
- सगुण भक्तिकाव्य (अ) भक्ति काव्य (ब) चरित काव्य
- चरित काव्य अभिनय साहित्य।
आधुनिक काव्य - 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से आरंभ होकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक का कालखंड है। इस काल में राजनैति, राष्ट्रीय, सामाजिक चेतना के उदय का भी यही समय है। सभी भारतीय भाषाओं विकास - रेखा का लगभग यही क्रम रहा है।
उपर्युक्त विवेचन भारतीय साहित्य की वस्तुपरक एकता स्पष्ट करने का उपक्रम है। भारतीय साहित्य में शिल्पगत एकता भी रेखांकित करने योग्य है।
शिल्पगत ऐक्य को जाहिर करने के लिए हमें संस्कृत साहित्य पर विचार करना होगा। लगभग सभी भारतीय भाषाओं संस्कृत, खंडकाव्य, महाकाव्य, मुक्तक, कथा और आख्यायिका के अतिरिक्त अपभ्र्रंश से चरित काव्य प्रेमगाथा शैली, रास पद शैली आदि को अपनाया। देसी छंद, दोहा, चौपाई, छंद भारतीय वांग्मय के लोकप्रिय छंद है।
आधुनिक युग में पश्चिमी प्रभाव की सामग्री भारतीय साहित्य को दिशा देने में अहम भूमिका निभा रहा है। इससे प्रगीत काव्य, चतुष्पदी, शोकगीत, संबोधन गीत, गद्यगीत आदि की लोकप्रियता भारतीय साहित्य में बड़ी है। छायावादी विशेषताएं, चित्रात्मकता, लाक्षणिकता, गेयता, प्रतीकात्मकता आदि सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में स्थान बना चुकी हैं।
प्रसंगवश यह भी कहना जरूरी है कि अंग्रेजी ने भारतीय भाषाओं एवं साहित्य को समान रुप से प्रभावित किया है। इस धारणा से लगभग हर भारतीय भाषा एक रूप सी हुई जा रही है। हिंदी में हिंग्लिश, तमिल में तमलिश आदि की मिलावट अधुनातन प्रवृत्ति है।
उपर्युक्त विवेचन के साथ ही खेद सहित यह भी कहना पड़ता है कि भारतवर्ष का राजनीतिक ढांचा विविधता की ओर दृष्टि रखता है और अनेक रूपता अलगाव को प्रकाशित करता है। जबकि भारत वर्ष की एकता इस बात में निहित है - यदि तथ्य मिलता-जुलता है, तो अभिव्यक्ति के माध्यम की विविधता अध्ययन का बिंदु होना चाहिए न कि विभाजन का।
जैसे संत काव्य की अध्ययनों को संत कबीर के साथ ही नामदेव, रज्जब, तमिल के 'अठ्ठारह सिद्धतर' संत कवि, तेलुगू में वेमन, वीर ब्रह्मन कन्नड़ के सर्वज्ञ आदि को भी अध्ययन आवश्यक रूप से शामिल होना चाहिए। मघुराभक्ति के अध्येता को ओड़िया, बांग्ला, असमी, तेलुगु और कन्नड़ की मघुरा भक्ति साहित्य को जानकर अध्ययन पूर्ण करना चाहिए वरना एक ही भाषा का अध्ययन अधूरा और एकांगी है।
निष्कर्ष :-
निष्कर्ष यह है कि भारतीय साहित्य अभिव्यक्ति में भिन्नता रखते हुए भी, भाषागत विविधता के बावजूद अखंड भावात्मक एकता और शिल्पगत एकरूपता रखता है।
भारतीय को समग्रता में ग्रहण करने पर ''इस अंतः साहित्य शोध प्रणाली के द्वारा अनेक लुप्त कड़ियां अनायास ही मिल जाएंगी, अगणित जिज्ञासाओं का सहज ही अंत हो जाएगा। साथ ही भारतीय चिंताधारा एवं रागात्मक चेतना की एकता का उद्घाटन हो सकेगा।"
भारतीय साहित्य डॉ नगेंद्र भूमिका पृष्ठ 11
भारतीय साहित्य की स्थापनाएं एवं प्रस्तावनाएं, के सच्चिदानंद, फ्लैस से।
भारतीय साहित्य, डॉ नगेंद्र, भूमिका, पृ. XXXLL .
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