भारतीय साहित्य के अध्ययन की प्रमुख समस्याएं : इकाई 1 एम. ए. हिंदी साहित्य प्रश्न पत्र चार

 भारतीय साहित्य के अध्ययन की प्रमुख समस्याएं

भारतीय साहित्य से तात्पर्य अखिल भारतीय स्तर पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में अब तक लिखे जा रहे साहित्य से है। जिन भारतीय भाषाओं में यह साहित्य लिखा जा रहा है। उन्हें मोटे तौर पर हम आधुनिक आर्य भाषाएं और द्रविड़ भाषाएं जैसे दो वर्गों में बांट सकते हैं।

जहां एक प्राचीन साहित्य का संबंध है। वह लगभग पिछले दो हजार वर्षों पुराना साहित्य है, जो मुख्यतः संस्कृत में उपलब्ध है, ऐसा कुछ साहित्य विभिन्न अपभ्रंश, प्राकृत और द्रविड़ भाषाओं में विशेषकर तमिल में उपलब्ध है। आधुनिक कहा जाने वाला साहित्य परिणाम में बहुत अधिक लिखा जा चुका है और लिखा भी जा रहा है। जब हम इस पूरे साहित्य के अध्ययन की समस्याओं पर विचार करते हैं। तो यह समस्याएं प्राचीन और आधुनिक दोनों ही प्रकार के साहित्य से जुड़ी हुई हैं।

प्राचीन साहित्य का अधिकांश चूंकि संस्कृत में है। इसलिए इसे लेकर इतनी समस्या नहीं है। कितनी भी प्राचीन अप्रैल और तमिल साहित्य को लेकर है। आधुनिक साहित्य को लेकर ये समस्याएं कई गुण इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि आधुनिक भाषाओं की संख्या जिनमें साहित्य लिखा जा रहा है 26 से अधिक है। भारतीय साहित्य के अध्ययन से जुड़ी समस्याओं पर विचार करते समय पहली बार और सबसे बड़ी समस्या भारतीय भाषाओं के क्षेत्रीयता है।

उदाहरण के लिए बांग्ला, मराठी, गुजराती, उड़िया, तेलगु, मलयालम इत्यादि भाषाएं अपने-अपने प्रांतों में ही सीमित लेकर गई है। हिंदी को छोड़कर कोई भी ऐसी प्रांतीय भाषा नहीं है। जिसे पूरे भारत में बोला और समझा जाता हो। स्वभाविक है ऐसी भाषाओं में लिखित साहित्य भी प्रांतीय दायरे में सीमित होकर रह जाता है। कन्नड़ की कोई अच्छी रचना उत्तर भारत तक नहीं पहुंच पाती। इसी प्रकार उत्तर भारत की भाषाओं की रचनाएं दक्षिण क्षेत्रों में प्रवेश नहीं पा सकती। फलस्वरूप श्रेष्ठ साहित्य थी एक ही देश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक अंजान बना रहता है। एक बार यह प्रयास सामने आया था कि प्रत्येक प्रांत में स्कूली स्तर से त्रिभाषा फार्मूला हो अर्थात अंग्रेजी, प्रांतीय भाषा तथा तीसरी, दूसरे प्रांत की भाषा को बढ़ाय जाने की व्यवस्था है। इस योजना से साहित्य ने अध्ययन में सहायता मिली मिल सके योजना से साहित्य के अध्ययन में सहायता मिल सकती थी। परंतु यह योजना सफल नहीं हो सकी।

अतः भारत के संदर्भ में भारतीय भाषाओं की ज्ञान की सीमा-बंदी भारतीय साहित्य के अध्ययन में सबसे बड़ी समस्या है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा की अंग्रेजी तथा अन्य विषय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद हिंदी में प्रायः उपलब्ध रहता है। इसी प्रकार यह अनुवाद अन्य विषय भाषाओं के तरफ से साहित्यकारों और अन्य भारतीय भाषाओं में सुलभ होता है। इसके विपरीत स्वयं भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य का एक से दूसरी भाषा में अनुवाद उपलब्ध नहीं होता।

भारतीय साहित्य के अध्ययन की समस्याएं-

पुरस्कृत रचना का अनुवाद अन्य भाषाओं में सामने आता है। अनुवाद की कमी के कारण भारतीय पाठक अन्य भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ लेखकों और उनके साहित्य से अनभिज्ञ रहता है। इस दिशा में सरकारी स्तर पर ही प्रयास किए जाते हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं भी कुछ योगदान देती हैं। बड़े आश्चर्य की बात यह है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में नहीं मिल पाता। भारत जैसे देश में  अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में तो मिल जाता है लेकिन एक से दूसरी भारतीय भाषाओं में नहीं मिल पाता। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में साहित्य के प्रति आम आदमी की रूचि का अभाव है वस्तु स्थिति तो यह है करोड़ों की जनसंख्या में हजारों पाठक भी नहीं है किसी अच्छी रचना की वर्ष भर में कभी-कभार कभी-कभी 1000 प्रतियां बिकना भी मुश्किल होता है। जबकि अंग्रेजी जैसे भाषा की किसी भी चर्चित रचना की लाखों प्रतियां हाथों हाथ बिक जाती है। ऐसी स्थिति में जब अपनी ही भाषा में पाठक का अभाव दूसरी भाषाओं में लिखित साहित्य में रुचि कैसे दिखा सकता है। भारत में अंतर प्रांतीय स्तर पर साहित्यिक सम्मेलनों का अभाव है यदि सरकार के स्तर पर विश्वविद्यालयों या अन्य संस्थाओं के स्तर पर ऐसे मंच प्रदान किए जाएंगे विभिन्न भाषाओं के साहित्य वहां उपस्थित हो सके और चर्चा परिचर्चा कर सके तो साहित्य का आदान-प्रदान बहुत सटीक है और तेजी के साथ हो सकता है। आम पाठक की बात तो क्या आज तो एक अच्छा लेखक दूसरी भाषा के अच्छे लेखक का नाम तक नहीं जानता इसी दिशा में राष्ट्रीय समस्याओं को लेकर विभिन्न भाषाओं के लेखक यदि साची शब्दियों में भागीदारी करे तो एक दूसरे के साहित्य से परिचित हुआ जा सकता है। भारत में साहित्य से जुड़े पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बहुत सीमित है अखिल भारतीय साहित्य को लेकर कोई भी पत्रिका प्रकाशित नहीं होती। यदि लगातार इस या उस भाषा  साहित्य को और अनुवाद सहित प्रकाशित किया जाए तो ऐसा साहित्य धीरे-धीरे पूरे देश तक पहुंच सकता है और पाठक इस प्रकार क्षेत्रीय और अन्य भाषा के साहित्य से परिचित हो सकता है। अतः साहित्य के अध्ययन का एक माध्यम शोध भी होता है जहां सामान्य पाठक साहित्य को अपनी खुशी और संतोष के लिए पड़ता है। वही पर शोधार्थी शोध के उद्देश्य से रुचि लेता है भारतीय साहित्य के प्रसार की सीमाएं बढ़ सकती हैं। उदाहरण के लिए आम हिंदी भाषी क्षेत्रों के हिंदी लेखकों और शोधार्थियों को पुरस्कृत किया जाता है यदि इसी प्रकार के क्षेत्रों से दूसरी भाषाओं में लेखन अध्ययन और शोध करने वालों को पुरस्कृत करने की योजनाए हो तो उस पाठ के लेखक दूसरी भाषा के साहित्य में अधिक रुचि दिखाएंगे इसलिए भी सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही स्तरों पर प्रयास की जरूरत है। किसी भी देश का साहित्य उस देश की समस्याओं के चित्रण पर केंद्रित होता है भारत जैसे बड़े देश में राष्ट्रीय स्तर की समस्याएं एक समान है। परंतु प्रांतीय आधार पर इन समस्याओं में भिन्नता और अधिक दिखाई पड़ती है। इसे आर्थिक और राजनैतिक आधारों पर भी देखी जा सकती है और दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों की समस्याएं भारत के नगरों कस्बों और ग्रामीण अंचल से भिन्न है। इसी प्रकार एक प्रांत के ग्रामों की समस्याएं दूसरे प्रांत के ग्रामों से भिन्न है। उदाहरण के लिए पंजाब और हरियाणा की भूमि उपजाऊ है। इन प्रांतों में गरीबी रेखा से नीचे शायद ही कोई व्यक्ति मिले। 

भारतीय साहित्य

राजस्थान बाढ़ और सुरक्षा पीड़ित उड़ीसा में बहुत अधिक गरीबी दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार रीति-रिवाजों की दृष्टि से भारत के पूर्वांचल तथा जन-जाति क्षेत्रों में आधुनिकता की कोई किरण नहीं पहुंची। आज फिर बिहार जैसे प्रांत में जमीदारी प्रथा के अवशेष मौजूद हैं। जहां पर बेगार से लेकर आंखें फोड़ देने की घटनाएं सुनने को मिलती है। भारत के उत्तरी क्षेत्रों में शिक्षा अधिक है वहां की समस्या भिन्न प्रकार की है। इसलिए विभिन्न भाषाओं में लिखित यह भारतीय साहित्य एक ही काल में एक जैसी बात नहीं करता। हम यह भी नहीं कह सकते कि अमुक साहित्य में वर्णित समस्याएं भारतीय नहीं है। कुल मिलाकर भारतीय साहित्य को जानने के लिए सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य की समस्याओं को समझना होगा। इधर अभी एक और नया अध्याय प्रवासी भारतीयों के रूप में खुल गया है। विशेष कर पंजाब क्षेत्रों में यह समस्या बार-बार सामने आ रही है कि कोई भी प्रवासी यहां की लड़कियों से विवाह करता है, जबकि वह पहले से विवाहित होता है या तो ऐसी विवाहिताओं को साथ ले जाता है तो उसे उसके हाल पर छोड़ कर घर से निकाल देता है। कभी-कभी ऐसी विवाहिताएँ माता भी होते हैं। इन समस्याओं पर केंद्रित साहित्य भी प्रकाश में आ रहा है और यह साहित्य भारतीय साहित्य है। कुल मिलाकर भारतीय साहित्य अनेक समस्याएं और उन सभी समस्याओं से पूरे भारत के लोग परिचित नहीं हैं। इसका मूल कारण यहीं है कि विभिन्न भाषाओं में अखिल भारतीय साहित्य भारत की सभी भाषाओं में लिखित भारतीय साहित्य की सभी भाषाओं में अनुदित नहीं होता।

 भारतीय साहित्य के अध्ययन की समस्याएं संक्षिप्त रूप में इस प्रकार है

  1. भारत में 30 से ज्यादा मुख्य भाषाएं हैं
  2. अध्ययन से संबंधित समस्याएं प्रमुख रूप से देखी जाती है
  3. कन्नड़ की कोई रचना उत्तर भारत में नहीं पहुंच पाती और ना ही उत्तर भारत की रचना कन्नड़ हमें पहुंच पाती है।
  4. अंतरक्रांति सम्मेलन का अभाव है।
  5. पत्र-पत्रिकाओं की संख्या सीमित बहुत ही कम है जिसकी वजह से हिंदी साहित्य का विकास तो बाधित हो ही रहा है, साथ ही साथ भारतीय साहित्य के अंतर्गत आने वाले विभिन्न भाषाओं के साहित्य भी उतने अच्छे से विकास नहीं कर पा रहे हैं। जिसकी वजह से अध्ययन की समस्याएं उत्पन्न हो जाती है।
  6. आज तक भारतीय भाषाओं के अनुवाद काल परिस्थिति प्रवासी भारतीय साहित्य कारों विशेष द्वारा लिखे गए साहित्य से पूरे भारत के लोग परिचित नहीं है।

सारांश - 

  1. भारत की विशालता एवं भिन्न-भिन्न प्रांत में बटा होना - भारत विविधताओं से भरा तथा विभिन्न भाषाओं का देश है जहां अनेक पहले अनेक प्रांत बटे हुए थे इस प्रकार यहां प्रांत में बटे होने के कारण यहां का साहित्य की रचनाएं भी उन प्रांतो के अनुसार हुआ। और बहुत बड़े क्षेत्र होने के कारण यहां के साहित्य का अध्ययन करना समस्याओं से भरा पड़ा है। 
  2. भाषाओं की बहुलता - आपको भारत विभिन्न प्रकार के विविधताओं से दिखाया देता है यह भारत केवल विविधता से नहीं बल्की विभिन्न भाषाओं से भी युक्त है। अब यहां बहुत सारे प्रांत तथा विभिन्न जाती में और क्षेत्र में बंटा हुआ है। और सभी क्षेत्रो की अपनी अपनी अलग अलग भाषाएं हैं। जिसके कारण भाषाओं की बहुलता इतनी अधिक हो जाती है की अध्ययन कर पाना असम्भव हो जाता है।  
  3. जातिगत विविधताएँ - भारत विभिन्न जातियों से युक्त देश है जहां अनेक जातियां और सम्प्रदाय के लोग पाए जाते हैं जिनकी भाषाएँ भी अलग अलग हैं और जिनके साहित्य भी विपुल मात्रा में है। लेकिन इनका अध्ययन कर पाना इसलिए मुश्किल हो जाता है क्योकि जातिगत विविधता अर्थात इसमें बहुत ही कम समानता पाई जाती है जिसके कारण अध्ययन की समस्या उत्पन्न हो जाती है। 
  4. समस्त भाषा साहित्य की उपलब्धि असम्भव - भारत में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पर साहित्य के हमें सिर्फ अवशेष रूप में मुखरित बोली के रूप में और वहाँ की जनता के बीच में केवल मौखिक रूप में उपलब्ध है। जिसका कोई भी प्रमाणित ग्रंथ नही है। 
  5. अनुवाद की समस्या - चुकी सभी भाषाओं के बारे में जानने में बहुत समय लगता है और समय लगने के बाद भी वहां के साहित्य के विस्तृत अध्ययन के लिए भी अधिक समय लगता है इस प्रकार वहां पर अनुवाद को सीखना बहुत ही मुश्किल है मान लिया जाए की कुछ अनुवाद आ भी गया उस साहित्य के अध्ययन में पूरा जीवन निकल जाता है। जिसके बाद भी अनुवाद करना मुश्किल हो जाता है क्योकि भारतीय साहित्य विभिन्न भाषाओं से भरा पड़ा है। 
  6. प्रचुर साहित्य भंडार की समस्या और बहुत सारी विधाएँ - किसी भी भाषा साहित्य का अगर हम अध्ययन करें तो प्रचुर साहित्य भंडार हमारे नही है जिसका की अध्ययन किया जा सके। क्योंकि कई ऐसी रचनाएं हैं जो की केवल मुखरित हैं जिनका लिखित रूप उपलब्ध नहीं है। 
  7. रचना विधि को लेकर विभाजन - भारतीय साहित्य में रचना विधि को लेकर भी बहुत सारे भ्रम पैदा होते हैं। क्योंकि विभिन्न प्रकार के भाषाओं और परम्पराओं के कारण यहां की रचना विधि में भी भिन्नता हमें देखने को मिलती है।
  8. कल्पना मात्र की जा सकती है। समस्त साहित्य के एक-एक बून्द का अध्ययन - भारतीय साहित्य अथाह है जिसका सम्पूर्ण अध्ययन कर पाना बहुत ही कठिन कार्य है। भारतीय साहित्य के अंतर्गत केवल हिंदी साहित्य ही नहीं आ जाता है, बल्कि भारत के सम्पूर्ण साहित्य इसके अंतर्गत आ जाते हैं। इस प्रकार इसके अध्ययन की मात्र कल्पना ही की जा सकती है। इस प्रकार देखें तो भारतीय साहित्य में हिंदी साहित्य का भी अगर सम्पूर्ण अध्ययन कर लिया जाए भिर भी यह भारतीय साहित्य का बूंद मात्र है।
  9. आर्थिक समस्या - यह भारतीय साहित्य के अध्ययन ही नहीं बल्कि भारत की दुर्दशा का कारण रहा है अभी का नहीं बल्कि आजादी से लेकर आज तक की आज किसानों के द्वारा आंदोलन किया जा रहा है। लेकिन उनकी कोई नहीं सुनता है। इसी प्रकार भारतीय साहित्य के अध्ययन में हमें आर्थिक समस्याएं देखने को मिलती है। जैसे कि यदि कोई किसी विषय पर शोध करना चाहता है तो उसे पैसे को जरूरत होती है। तो यह एक प्रमुख समस्या है।
  10. मूल्यांकन की समस्या विभिन्न मापदंड की समस्या - किसी भी खेल या ऐसे प्रतिस्पर्धा में मूल्यांकन अपना एक अलग ही महत्व रखता है। बिना मूल्यांकन के हम यह जान ही नहीं पाते की आखिर किस हद तक हम साहित्य के बारे में जानते हैं और किस प्रकार उसकी अनेक भाषाओं के साथ तुलना करके उसका मूल्यांकन किया जाए यह कैसे बताए कि कौन सा साहित्य श्रेष्ठ है। 


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