भारतीय साहित्य में आज के भारत का बिम्ब : इकाई 1 एम. ए. हिंदी साहित्य प्रश्न पत्र चार
भारतीय साहित्य में आज के भारत का बिम्ब
इससे संबंधित निम्न सवाल बन सकते हैं जो की इस प्रकार हैं -
- भारतीय साहित्य में आज के भारत के बिम्ब की दृष्टि से मुलभूत एकता पर प्रकाश डालिए।
- भारतीय साहित्य में आज के भारत का प्रतिबिम्ब उपलब्ध होता है, इस कथन पर तर्कपूर्ण ढंग से प्रकाश डालिये।
- क्या आधुनिक भारतीय साहित्य में मानवतावाद, लोककल्याण , आध्यात्मिकता के स्वर विद्यमान हैं, सोदाहरण प्रकाश डालिए।
- क्या भारतीय साहित्य में वर्तमान भारत प्रतिबिम्बित है। तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय जन-जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए। आजादी के बाद की पीढ़ी जब युवा हुई तो उसका लोकतंत्र और उसके नेतृत्व से मोहभंग होने लगा था। परम्परागत समस्याएं तो विद्धमान थी हीं, युवा पीढ़ी को नयी समस्याओं से भी जूझना पड़ा। भारतीय जनमानस पर इसकी गंभिर प्रतिक्रिया हुई। अशिक्षा, बेरोजगारी, निर्धनता जैसी आर्थिक समस्याएँ दहेज, नारी शोषण, दलितों का शोषण जैसी सामाजिक समस्याएं यथा भ्र्ष्टाचार, लूट, अराजकता, नेतृत्व का दोमुँहापन, आतंकवाद , लूट-हत्या जैसी समस्याएँ भारतीय समाज के समक्ष यथावत रहीं। ऐसे में समग्र भारतीय साहित्य का इन समस्याओं से अछूता रहना सम्भव नहीं था। आज के भारत का यह चित्र किसी क्षेत्र प्रांत और भाषा का नहीं है , यह समग्र भारतीय साहित्य में मिलता है। आज के भारतीय साहित्य में इसीलिए बहुत सारी प्रवृत्तियां यथावत विद्यमान है।
आज के भारत की समस्याओं का चित्रण समकालीन भारतीय साहित्य में न केवल देखा जा सकता है वरन ये कहानी लेखक एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। साहित्य अकादमी और नेशनल बुक ट्रस्ट के माध्यम से सभी समकालीन उत्कृष्ट रचनाएँ अपनी मूल भाषा एवं अन्य भाषाओं में समांतर रूप से प्रवाहित हो रही हैं जिससे सभी भाषाओं के लोग समकालीन भारतीय साहित्य से परिचित हो रहे हैं। लगान व्यवस्था और जनजागृति के महत्वपूर्ण पहलुओं से परिचित करता तकबी शिवशंकरे पिल्लै का उपन्यास 'रस्सी' सभी भाषाओं में उपलब्ध है। इसी प्रकार स्त्री शिक्षा की प्रगति से जुड़ा नारी जागृति का उपन्यास 'अनचला डगर' उड़िया का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। नारीवादी विमर्श की दृष्टि से आज अनेक आंदोलन हो रहे हैं। इस दृष्टी से न केवल हिंदी वरन अन्य भाषाओं में भी अनेक कृतियाँ आई हैं। उनमें सुमुक्तिरम की 'एक घेरे से बाहर' , एस. एल. भैरप्पा की एक कन्नड़ रचना 'ग्रृहभंग', जयमोहन की तलिम कृति 'बदलते चेहरे' प्रमुख हैं।
आज के लेखकों ने भारतीय जन-जीवन को ही नहीं हर क्षेत्र में व्याप्त विकृतियों को सहजता से प्रस्तुत किया है। इस दृष्टि से मलयालम उपन्यास 'दवा' का उल्लेख किया जा सकता है जिसके लेखक पुनस्तील कुंजबदुल्ला हैं। इस उपन्यास में चिकित्सा की दुनिया के अविश्वसनीय खोखलेपन और विद्रूप का चित्रण किया गया है।
वस्तुतः आज का भारतीय साहित्य एक समान उत्स से प्रेरणा पा रहा है। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय एकता के मूलमंत्र, एक संघीय व्यवस्था और सूचना क्रान्ति तथा नए जन-माध्यमों के प्रभाव ने भारतीय भाषाओं के मध्य दूरी को कम किया है। अतः परस्पर आदान-प्रदान की स्थिति बनी है।
आज के भारतीय साहित्य का विकास प्रायः एक साथ हुआ। भारतीय भाषाओं में अपने साहित्य के प्रति गौरव बोध है। विद्यापति भाषा की दृष्टि से भले ही हिंदी के माने जाते हैं लेकिन मिथिला के लोग उन्हें मैथिली का कवि मानने में गर्व का अनुभव करते हैं। बंगला की ब्रजबुलि मूलतः ब्रजभाषा है किन्तु बंगाल के लोग उन्हें अपना कवि मानने में गर्व का अनुभव करते हैं। द्रविण परिवार की आज चार भाषाएँ हैं। उनमें परस्पर नैकट्य है। द्रविण तमिल का ही प्राचीन रूप है किन्तु आज कन्नड़ और मलयालम से साहित्यकार द्रविण का नहीं कन्नड़ का साहित्यकार कहलाने में गौरव का अनुभव करते हैं।
आज के भारतीय साहित्य की सामान्य विशेषताएँ
- समकालीन भारतीय साहित्य में सामाजिक परिवर्तन का स्वर समान रूप से मिलता है।
- सभी भारतीय भाषाओं के वर्तमान साहित्य में दलित एवं नारी चिंतन का स्वर विद्यमान है।
- हिंदी ही नही बल्कि बंगला, पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम जैसी भाषाओं में कविता से अधिक कथा-साहित्य का महत्व बढ़ा है।
- भारतीय-भाषाओं के साहित्य में भ्रष्टाचार, राजनीतिज्ञों के विरुद्ध वातावरण तथा पूंजीवादी शक्तियों के विरुद्ध आक्रोश मुखर है।
- स्थान भेद भाषा भेद के बावजूद भारत की सभी भाषाओं के साहित्य में व्यवस्था के प्रति विद्रोह एवं राष्ट्रीय चेतना की भावना समान रूप से विद्यमान है।
- समकालीन भारतीय साहित्य में सामाजिक क्षेत्र का विस्तार हुआ है और हर भाषा की शब्दावली का प्रयोग बखूबी हो रहा है।
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